गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

भ्रमरगीत की कथा और स्वरूप पर प्रकाश डालिए। | SURDAS | BRAMARAGEETH

भ्रमरगीत की कथा और स्वरूप पर प्रकाश डालिए।

रूपरेखा :

1. संक्षिप्त कथा

2. श्रीकृष्ण का सन्देश

3. मूलस्रोत भागवत

4. काव्य का प्रतिपाद्य

5. प्रेमानुभूति

6. उपसंहार

1. संक्षिप्त कथा :

'भ्रमरगीत' सूरसागर की सर्वोत्कृष्ट रत्नराजि है। यह विप्रलम्भ श्रृगार का काव्य है। कृष्ण गोपियों से प्रेम- क्रीडाएँ करके उनको अपने वियोग में व्यथित होते छोड कर मथुरा चले जाते हैं। मथुरा में कंस का वध करके राजकाज में वे व्यस्त हो जाते हैं। अतः उनको गोकुल लौटने का अवसर नहीं मिलता। तब वे अपने ज्ञानी मित्र उद्धब को गोकुल में माता-पिता, बाल-बाल और गोपिय को सांत्वना देने के लिए भेजते हैं। गोकुल मे जाकर उद्धव का गोपियों से बाद विवाद होता है। उस वाद विवाद में उद्भव हार जाते हैं और गोपियों की प्रेम भावना में निमग्न हो कर वे मथुरा लौट जाते हैं।

2. श्रीकृष्ण का सन्देश

कृष्ण उद्धव को ब्रज में जाकर माता-पिता की कुशलक्षेम जानने और उनको सान्त्वना देकर सन्तुष्ट करने को प्रेरित करते हैं। साथ ही वे उद्धव से यह भी कहते हैं कि वे गोपियों को समझा-बुझा कर उनकी वियोग पीडा का शमन करें और सान्त्वना प्रदान करें।

3. मूलस्रोत भागवत :

भ्रमरगीत का मूल स्रोत व्यास विरचित श्रीमद्भागवत है। भागवतकार गोपी- उद्धव संवाद के बीच एक भ्रमर को ला देते हैं। भ्रमर उडता हुआ आता है और एक गोपी के चरण को कमल समझ कर उस पर बैठ जाता है। गोपियाँ उद्भव को छोड़कर उस भ्रमर के पीछे पड जाती हैं। भ्रमर को लक्ष्य करके वे कृष्ण औ उद्धव को खरी खोटी सुनाने लगती हैं। गोपियों के समक्ष उद्धव का सारा ज्ञान - गर्व चला जाता है। भागवत के उस मूल कथानक के आधार पर 'भ्रमरगीत' की रचना हुई हैं।

4. काव्य का प्रतिपाद्य : -

सूरदास के 'भ्रमरगीत सार' के साथ हिन्दी काव्य में भ्रमरगीत की परम्परा आरम्भ होती है। ज्ञान के ऊपर भक्ति का विजय घोष इस काव्य की विशेषता है। तर्कशैली का परित्याग करके नाटकीय विधान एव सरस भाषा के आधार पर ज्ञानमार्ग की उपेक्षा भक्तिमार्ग की श्रेष्ठता भ्रमरगीत काव्य का प्रतिपाद्य विषय है।

प्रज्ञाशील कवि सूरदास गोपियों द्वारा भक्तिरस की मधुरता का प्रतिपादन कराते हैं। गोपियाँ अपने भोलेपन, अपनी सरलता एवं कृष्ण प्रेम की अनन्यता के द्वारा उद्धव जैसे ज्ञानी को निरुत्तर करके भक्तिरस में तन्मय भी करा देती हैं।

सुन गोपिन को प्रेम नेम ऊधो को भूल्यो।

गावत गुन गोपाल फिरत कुंजनि में भूल्यो।

छन गोपिन के पग धेरै धन्य तिहारो प्रेम।

कृष्ण का बाल्यकाल गोकुल में व्यतीत होता है। वहीं साथ- साथ खेलते-खाते और गायें चराते हुए उनका गोकुल के ग्वाल एवें वहाँ की ग्वालिनों से प्रेम हो जाता है। लडकपन का साहचर्य - प्रेम किसी भाव में नहीं छूट सकता हैं। इसी लिए उद्धव गोपियों की विवशता को समझ पाते हैं -

लरिकाई को प्रेम कहो अलि कैसे छूटे?

परिस्थितियों के वश में पडकर लडकपन के साथी बिछुड गये। एक दूसरे की याद करके वे सदैव दुःखी बने रहते हैं। बस, उनके वियोग की कथा ही 'भ्रमरगीत सार' का प्रतिपाद्य विषय है।

5. प्रेमानुभूति :

'भ्रमरगीत सार' में श्रीकृष्ण के बाल्यकाल एव यौवनकाल के मनोहर चित्र हैं। कृष्ण उद्धव के समक्ष अपने प्रेम की चर्चा करते हुए कहते हैं -

उधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं।

हंससुता की सुन्दर कगरी, अरु कुंजन की छाही।

वे सुरभी वै बच्छ दोहनी, खरिक दुहावन जाही।

यह मथुरा कंचन की नगरी मनि मुकताहल जाहीं।

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जबहिं सुरति आवृति वा सुख की जिय उमगत तम नाहीं।

गोपियों और कृष्ण का सम्बन्ध आत्मा और परमात्मा के सम्बन्ध के समान है। गोपियों के प्रेम में आत्मोत्सर्ग की भावना बढ़ती जाती है। कृष्णभक्ति में विह्वल हो गोपियाँ कहती हैं -

ऊधो, भन नाहीं दस बीस

एक हुतो सो गयो स्याम संग को आराधे ईस?

कृष्ण जब से मथुरा गये हैं, तब से गोपियों के नेत्रों में वर्षा आ जाती है। उनकी आँखें श्रावण - भादों के मेघों के रूप में बरसती रहती हैं। क्षण भर के लिए भी आँसू बन्द नहीं होते हैं -

निसि दिन बरसत नैन हमारे,।

सदा रहति पावस रितु हम पै, जब तैं स्याम सिधारे।

ट्टंग अंजन लागत नहिं कबहुँ, उर कपोल भए कारे।

कंचुकि पट सूखत नहिं कबहूँ, उर बिच बहत पनारे।

गोपियाँ अपनी विरह-वेदना के सम्बन्ध में ढिंढोरा पीटती हुई कहती हैं 'प्रीति करि काहू सुख न लहयौ'।

6. उपसंहार :

गोपियों की प्रेमतन्मयता को देखकर उद्धव का ज्ञान-गर्व चला जाता है और उनकी प्रेम भक्ति पर आस्था हो। जाती है। वे मथुरा लौटकर गोपियों की दशा का वर्णन करते हैं और कृष्ण को निष्ठुर बताते हैं। भागवत का उद्देश्य केवल धर्म साधना है। भगवत की कथा समस्त भ्रमरगीतों का आधार है। -

गोपियों के प्रेमानुभूति के सामने उद्धव निरुत्तर एवं पराजित- से दिखाई देते हैं। गोपियों की प्रेम दिहलता देख कर उद्धव गद्गद् हो जाते हैं। और प्रेमाश्रुपूरित लौट कर कृष्ण के चरणों में गिर पड़ते हैं। कृष्ण पीताम्बर से उन के आँसू पोछ कर उनकी दशा पूछते हैं।

प्रेम विह्वल ऊधो गिरे नैन जैल छाय

पोछि पीत पट सो कही, आए जोग सिखाय

यही निर्गुण के ऊपर सगुण का और ज्ञान के ऊपर भक्ति की श्रेष्ठता और सरलता की प्रतिष्ठा है।