श्रीमदभागवत् और सूरदास के 'भ्रमरगीतों' की तुलना कर स्पष्ट कीजिए कि सूरदास का भ्रमरगीत किन-किन बातों में मौलिक है।
रूपरेखा :
1. प्रस्तावना
2. भागवत की कथा
3. भागवतकार का उद्देश्य
4. श्रीमद्भागवत् और सूरदास के भ्रमरगीत के कथानक की तुलना
5. सूरदास की मौलिकता
6. सूरदास के तीन भ्रमरगीत
7. उपसंहार
1. प्रस्तावना :
हिन्दी साहित्य में उपालम्भ काव्य के रूप में 'भ्रमरगीत' का विशेष महत्त्व है। 'भ्रमरगीत' शब्द 'अमर' और 'गीत' दोनो शब्दों के योग से बना है। 'भ्रमरगीत' शब्द का अर्थ - 'भ्रमर का गान' अथवा 'भ्रमर को लक्ष्य करके गाया हुआ गान' होता है।
'भ्रमरगीत' विप्रलम्भ श्रृंगार का काव्य है। कृष्ण गोपियों से प्रेम- क्रीडायें करके उनको अपने वियोग में तडपते छोड कर मथुरा चले जाते हैं। मथुरा में कंस का वध करके राज-काज में वे इतना अधिक व्यस्त हो जाते हैं कि उन को गोकुल लौटने का अवसर ही नहीं मिलता। वे अपने ज्ञानी मित्र उद्धव को गोकुल में माता-पिता, ग्बाल-बाल और गोपियों को सान्त्वना देने के लिए भेजते हैं। 'गोकुल में उद्धव का गोपियों से वाद-विवाद होता है। उस वादोपबाद में उद्धव हार जाते हैं और गोपियों की प्रमानुभूति में निमग्न होकर वे मयुरा लौट जाते है।
'भ्रमरगीत' का इतना ही सक्षिप्त और सीधा कथानक है। इसका मूल स्रोत श्रीमद्भागवत् है।
2. भागवत की कथा :
भागवत में कृष्ण उद्धव को ब्रज में जाकर माता- पित्ती की कुशल क्षेम जानने और उनको समझा बुझाकर प्रसन्न एवं संतुष्ट करने को प्रेरित करते हैं। साथ ही वे उद्धव को और बताते हैं कि वे गोपियों की वियोगावस्था का शमन करें और सान्त्वना प्रदान करें।
भागवत की गोपियाँ पहले कृष्ण की कुशलक्षेम पूछती हैं और तदुपरान्त उन्हें उपालम्य देती हुई विरह वेदना से व्याकुल हो रो पड़ती हैं। गोपियों के अनन्य प्रेम को देखकर उद्धव मुग्ध हो जाते हैं और उनकी प्रशंसा करने लगते हैं। उसी समय कहीं से एक भ्रमर उड़ता हुआ आता है और एक गोपी के पैर पर बैठ जाता है। वह गोपी भ्रमर को लक्ष्य कर पुरुष द्वारा प्रेम के क्षेत्र में विश्वासधात को लेकर उसकी भर्त्सना करती है। गोपियों की दृढ़ प्रेमासक्ति देख कर उद्धव का हृदय उनके प्रति श्रद्धा से भर जाता है। वे ज्ञान, योग, कर्म आदि की तुलना में गोपियों की इस एकान्तिक भक्ति भावना की प्रशंसा करते हैं।
3. भागवतकार का उद्देश्य :
'भागवत' के उद्धव गोपियों को ज्ञान और योग का उपदेश देने नहीं आते। वे गोपियों को ज्ञान, योग और निर्गुण का उपदेश देना प्रारम्भ नहीं करते।
'भ्रमरगीत' की रचना में भागवतकार का उद्देश्य ज्ञान और भक्ति का द्वन्दव दिखाने का नहीं था। भागवत में ज्ञान, कर्म और भक्ति का सामंजस्य हुआ है। भागवतकार के अनुसार कृण का मथुरा- गमन सोद्देश्य है। गोपियों के प्रेम की दृढता को और भी अधिक गम्भीर एव गहन बनाना भागवतकार व्यासजी का उद्देश्य रहा।
भागवत में कृष्ण गोपियों को एकांत भक्ति की चित साधना सिखाना चाहते हैं और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे मथुरा चले जाते हैं। भागवतकार का उद्देश्य केवल धर्म-साधना का है। गोपियों के चित में स्थिरता लाने के लिए ही कृष्ण जान बूझ कर ब्रज से मथुरा चले जाते हैं।
4. 'श्रीमद्भागवत्' और सूरदास के 'भ्रमरगीत' के कथानक की तुलना
भ्रमरगीत का मूलस्रोत श्रीमद्भागवत् दशम स्कन्ध पुर्वार्ध के ४६ वें अध्याय में है, पिता तथा गोपियों को सान्त्वना प्रदान करें। उस आदेश के अनुसार उद्धव ब्रज पहुँचते हैं। वे वहाँ जाकर प्रजभूमि की कला झाँकी का दर्शन करते हैं। ये नन्द और यशोदा से मिलते हैं। कुशल क्षेम के पश्चात नन्दबाबा तथा यशोदा दुःख निवदेन करते हैं। उन उनके भाग्य की सराहना करते हैं और फिर श्रीकृष्ण के आत्म स्वरूप होने पर एक व्याख्यान-सा देते हैं और बातें करते हुए रात्रि व्यतीत हो जाती है।
प्रातः काल गोपियों से उद्धव की भेंट होती है। वे कहती हैं "उन्होंने आप को माता पिता को सान्त्वना देने के लिए भेजा है। अब हम से क्या मतलब ?" बस, यहीं से उपालम्भ आरम्भ हो जाता है। गोपियाँ कृष्ण की लीलाओं का स्मरण करके ये उठती हैं। इसी समय एक भ्रमर आकर एक गोषी के पैर पर बैठ जाता है। उसी को संबोधित करके गोपियों पुरुषों द्वारा प्रेम में किये गये विश्वासघात को लक्ष्य बना कर उपालम्भ देती हैं।
उद्धव गोपियों की प्रेमानुभूति पर मुग्ध होते हैं और स्वयं व्रज रजकण होने की आकांक्षा प्रकट करते हैं जिससे वे प्राप्त कर सके। गोपियशान्त हो जाती हैं। कुछ महीनों बाद उपस जाने लगते ब्रजांगनाओं की चरणरज है तो गोपगण, नन्दबाबा, यशोदा आदि यही कहते हैं कि उन्हें मोक्ष की इच्छा नहीं है। वे सब यही चाहते हैं कि उन के मन की एक एक वृत्ति, एक एक संकल्प श्रीकृष्ण में ही लगे रहे।
सूरदास के उद्धव तो ब्रज जाने के लिए तैयार होते हैं। कृष्ण के मोह भरे वचनों को सुनकर वे मुस्कराते हैं और मन ही- मन ज्ञान-गर्व प्रकट करते हैं।
श्रीकृष्ण उद्धव से केवल सान्त्वना देने को ही नहीं कहते हैं, अपिंतु निर्गुण उपदेश की बात कहते हैं -
उद्धव ! यह मन निश्चय जानो।
पूरन ब्रह्मा सकल अविनासी ताके तुम हो ज्ञाता।
यह मत दै गोपिन कहँ आवउ॥
सूर की गोपियाँ मानों पहले से ही तैयार रहती हैं। वे उद्धव को आते ही घेर लेती हैं और मथुरा के यादवों पर व्यग्य करने लगती हैं।
“वह मथुरा काज की कोठरि जे आवें तो कारे।” सूरदास की गोपियाँ विकल और वाक्चतुरा हैं।
5. सूरदास की मौलिकता :
भागवतकार का उद्देश्य केवल धर्म साधना का है। कृष्ण गोपियें के चित में स्थिरता लाना चाहते हैं। भागवतकार के उद्धव गोपियों के कृष्ण प्रेम की सराहना करते हैं, जब कि सूरदास के उद्धव उनके कृष्ण प्रेम की निरर्थकता बताते हुए उन्हें ज्ञान और योग का उपदेश देने लगते हैं। गोपयिो के साथ उद्धव का उत्तर प्रत्युत्तर होता है। गोपियों की सरल निष्काम भक्ति के सामने उद्धव निरुत्तर एव पराजित से दिखाई देते हैं।
हम तौ दुहूँ भाँति फल पायौ।
जौ ब्रजराज मिलैं तो नीको नातरु जग जस गायौ।
गोपियों की प्रेम-बिह्नवलता को देखकर उद्धव गद्गद् हो जाते हैं और प्रेमाश्रुपूरित लौट कर कृष्ण के चरणों में गिर पड़ते हैं। कृष्ण अपने पीतमाम्बर से उनके आँसू पोंछकर उनकी दशा पूछते हैं।
प्रेम विह्नवल ऊधौ गिरे नैन जल छाय।
पोंछि पीत पर सों कही, आए जोग सिखाय।
मानो यही निर्गुण के ऊपर सगुण का, ज्ञान के ऊपर भक्ति की श्रेष्ठता और सरलता की प्रतिष्ठा है।
भ्रमरगीतसार में सूरदास ने नारी के तप और योग के स्थान पर उसके समर्पण और अनन्यता पर विशेष बल दिया है। उस सम्बन्ध में डॉ. उपाध्याय का कथन है- "पुराण और काव्य में जो अन्तर है वही भागवत और सूर के भ्रमरगीत में है।"
6. सूरदास के तीन भ्रमरगीत :
हिन्दी में सर्वप्रथम “भ्रमरगीत" रचने का श्रेय सूरदास को है। सूर के भ्रमरगीत में भागवत के भ्रमरगीत की अपेक्षा अनेक विशेषताएँ और मौलिकताएँ हैं।
सूरदास ने तीन भ्रमरगीतों की रचना की।
(क) प्रथम भ्रमर गीत : - सूरदास का प्रथम भ्रमरगीत भागवत के भ्रमरगीत का अनुवाद मात्र है। इसकी रचना दोहा, 'चौपाई' तथा 'सार' छन्द में है। इस में न तो सूर की नयी मान्यताएँ हैं या न ज्ञान वैराग्य की चर्चा ही।
(ख) द्वितीय भ्रमरगीत: :- सूर का द्वितीय भ्रमरगीत केवल एक ही पद में लिखा गया है। इस में उद्धव का गोपियों के प्रति उपदेश, गोपियों के उपालम्भ, उद्धव का मथुरा गमन एवं श्रीकृष्ण के समक्ष गोपियों के विरह का वर्णन तथा उसे सुन कर श्रीकृष्ण का मूर्च्छित हो जाना आदि सब एक ही छन्द में वर्णन किया गया है। इस में न तो भ्रमर का प्रवेश होता है और न गोपियाँ उपालम्भ ही देती हैं।
(ग) तृतीय भ्रमरगीत - सूर ने इस भ्रमरगीत को काव्यत्व का रूप प्रदान किया है। इस में कथा एवं भाव का क्रमबद्ध संयोजन है। इस काव्य में सूरदास भ्रमर के माध्यम से कृष्ण और उद्धव को मन भर कर उपालम्भ दिलाते हैं। अन्त में उद्धव के ज्ञानयोग और निर्गुणोपासना की पराजय होती है। सूरदास ने व्यास विरचित 'भ्रमरगीत' को परम्परानुसार - ग्रहण कर अपनी अद्भुत प्रतिभा से पूर्णता पहुँचा दी है।
7. उपसंहार
सूर के भ्रमरगीत का स्रोत व्यास विरचित भागवत तो है। सूर की कला में भगवत पुराण ने काव्यत्वका रुप धारण किया है। उन के युग में सगुण और निर्गुण की उपासना का भीषण द्वन्दव चल रहा था। सूरदास अपने भ्रमरगीत द्वारा निर्गुणोपासना का खण्डन करके साकारोपासना का प्रतिपादन किया है।
सूर के 'भ्रमरगीत' में ज्ञान की अपेक्षा भक्ति को श्रेष्ठ सिद्ध किया गया है। ज्ञान का खंडन और भक्ति का मंडन हुआ है।